विस्थापन का दर्द: मेहनत की ‘बुनियाद’ पर आपदा का पहरा, अब सरकार का सहारा

टिहरी जिले के भिलंगना ब्लाक के आपदाग्रस्त तिनगढ़ गांव के लोग बेघर हैं। चार दिन पहले तक उनके पास सब कुछ था। खेती-बाड़ी और अपना मकान। गांव में रौनक थी। हर किसी के चेहरे पर मुस्कान थी। भविष्य को लेकर सपने बुने थे। अब सब कुछ छूट गया।शरणार्थी जैसी स्थिति है। आपदा के कारण उम्मीदों में विराम लग गया है। उन्होंने सब कुछ अपने आंखों के सामने देखा। जिस मकान की मजबूत बुनियाद के लिए उन्होंने पसीना बहाया, संघर्ष किया, वह भरभराकर ध्वस्त हो गया। खेतों का पता ही नहीं चला। अब उनके आंखों में सिर्फ आंसू हैं।भविष्य को लेकर न कोई महत्वाकांक्षा है ना ही उम्मीद। बस दिन कट रहे हैं। टकटकी सरकार पर है। कब विस्थापन होगा, कब नए सिरे से वह अपनी नई पारी का ताना-बाना बुनेंगे, इसका भी अंदाजा नहीं है।

राजकीय इंटर कालेज विनयखाल में बने राहत शिविर में करीब 80 परिवारों के 150 लोगों को ठहराया गया है। भले ही राहत शिविर में ठौर और भोजन मिल रहा है लेकिन सभी के मन में यही सवाल है आखिर कब तक इस तरह दिन कटेंगे। उन्हें इस बात का मलाल है कि जिस मकान को बनाने के लिए उन्होंने दिनरात एक की, अब वह उनके काम का नहीं रहा।विशेष बात यह है कि गांव में ज्यादातर घर लिंटर वाले हैं। अब जिस स्कूल में वे रह रहे हैं वहां पांच हाल हैं। एक हाल में 25 से 30 लोग रह रहे हैं। कुछ लोग अपना बिस्तर लाए हैं, कुछ मदद प्रशासन की ओर से की गई है। प्रशासन की ओर से सभी के लिए भोजन बनाया जा रहा है।

कुछ महिलाएं आठ किमी दूर अपने गांव जाकर घर के दरवाजे खोल रही हैं, इस उम्मीद के साथ कि कुछ सामान समेट लिया जाए। इस गांव के ज्यादातर लोगों की आजीविका कृषि आौर पशुपालन है। कुछ युवा बाहर रहते हैं। आपदा की खबर सुनकर वे भी अपनों का हाल लेने राहत शिविर में आ रहे हैं।

गांव की यादें मलबे में दब गईं

सुचिता देवी और उनके शांति प्रसाद राहत शिविर में गुमसुम बैठे हैं। सुचिता देवी ने बताया कि उन्होंने दिहाड़ी करके और उनके पति ने होटल में मेहनत कर गांव में अपना मकान बनाया था लेकिन वह मलबे में दब गया। कभी सोचा भी नहीं था ऐसा होगा। अब उन्हें दूसरों के भरोसे रहना पड़ेगा।

85 साल की कमली देवी की आंखें नम हैं। कहती हैं तीन पीढ़ियां एक मकान में रहीं लेकिन अब एक झटके में वह तबाह हो गया। सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं। अब सरकारी सिस्टम के भरोसे रहना पड़ेगा। इस उम्र में यह सब देखना पड़ेगा। इसकी कल्पना तक नहीं की थी।महेश्वरी देवी व्यथित नजर आईं। उन्होंने कहा कि उनका मकान और सारे खेत मलबे में दब गए। इन्हीं खेतों के सहारे उनका जीवन चलता था। अपने घर से जुड़ाव था। यहीं अच्छा लगता था। अब अब न ही उनके खेत वापस आएंगे और न मकान मिलेगा।

प्रधान भी रह रहीं शिविर में

प्रधान रीना देवी और उनके पति शंभू प्रसाद भी राहत शिविर में रह रहे हैं। भूस्खलन के बाद उन्होंने अपने दोनों बेटे 13 साल के ऋषभ देव और 11 साल के रमन देव को नानी के घर भेज दिया है। वह ग्रामीणों के साथ रहकर उनका हौसला बढ़ा रही हैं।

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